होता है आश्चर्य बहुत
जब व्यक्ति कोई कुंठाग्रस्त
नाचती उसके इशारे पर
करती घर की चाकरी
अपनी औरत को अपना है
आधा अंग बताता , कभी भी
उसका होता नहीं, फिर भी समाज में
है झूठा प्रेम दिखाता, ना देता सम्मान
कभी, बस बातें खूब बनाता,
सारी बातें झूठी कहता,
सबको यही दिखाता ,पर
छला हो जिसने अपने को
वो क्या देगा सम्मान किसी को
इज्जत मान हर नारी की
बातें सभी किताबी उसकी
रंगा सियार का रंग भी आखिर
बदरंग तो हो ही जाना है ,
आधुनिक अकेली वेवा
साक्षर हर वो महिलाएं
कहता जिसे वो, बदचलन
दिखती उसको कटी पतंग सी
ऐसी हर वो नारी, जिसका
बन रक्षक करते शिकार
ऐसे मुखौटा धारी, अक्सर
डोर सहित करता है वो हर
उस पतंग को लूटने की तैयारी.....
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