Sunday, May 30, 2021
आप तो ऐसे ना थे________
Wednesday, May 19, 2021
मन के घाव______
आज सुबह से ही मन में एक अजीब सी बेचैनी हो रही थी सुजाता को एक खालीपन का एहसास, झुंझलाहट और बार - बार भीगी हुई आंखो के साथ कुछ काम करने की भी इच्छा नहीं हो रही थी। इच्छा हो भी तो कैसे आज ही तो सुजाता की शादी की बीसवीं सालगिरह है पर विशाल को गुजरे सात साल हो गए उसके बिना इन सात सालों में कितने ही कष्टों को सहते हुए दोनों बच्चों की अच्छी शिक्षा को जारी रखा किसी चीज की कमी का एहसास भी नहीं होने दिया पर आज दफ्तर से घर आने पर कुछ पल के लिए सुजाता अपने बीते हुए सुनहरे दिनों में विशाल की मीठी बातें की यादों में खोई हुई पलकों से लुढ़कते हुए मोती के साथ अकेले रहना चाहती थी । लेकिन बच्चों को उसका यूं चुपचाप होना नागवार गुजरा ।कमरे में आते ही मम्मी- मम्मी की रट लगाना शुरू कर दिया और एक के बाद एक फरमाइश की झड़ी ।बस सुजाता के इतना कहने भर से ही कि आज मुझे थोड़ी देर के लिए अकेला छोड़ दो घर में तो जैसे बवाल मच गया ।बड़े बेटे रोहन ने छोटे भाई करन से सुजाता के लिए कहा कि पापा क्यों चले गए, पूरे शहर में क्या एक यही मिली थी उनको बिल्कुल देहाती गंवारन की तरह आंसू बहाए जा रही है अच्छा होता अगर पापा की जगह.... आगे का शब्द सुनते ही सुजाता के मौन अब हिचकियों में बदल गये । वो सोच में पड़ गई। क्या वो मशीन है कि कब उसे ऑन होना है और कब ऑफ ,सब कोई और तय करेगा । उसके मन के भाव को तो उसके अपने समझ नहीं पाते कम से कम मन में घाव तो ना देते।भारी मन से यही सोचते हुए सुजाता बिस्तर से उठ कर रसोई की तरफ बढ़ चलीं।
निशांत_______
आज निशांत को पृथ्वी पर बसे मुम्बई मायानगरी और उस दुनिया को छोड़ें हुए लगभग दो हफ्ते से ज्यादा हो रहे थे, और अब उसे समझ आ रहा था कि पृथ्वीवासी उसे कितना चाहते हैं वो मृत्यु को चाहे जिस तरह प्राप्त हुआ हो मगर उसके फैंस उसके लिए इंसाफ की लड़ाई लड़ रहे हैं, काश ! वो उनलोगो का यह प्यार अपनी खुली आंखों से देख पाता, आज उसके जन्मस्थान पर चौक चौराहों के नाम उसके नाम से जाने जा रहें हैं उसका वो छोटा शहर, कितना प्यार करते हैं उसके अपने शहर के लोग और जब वो जिवित था उनके प्यार को समझ ही नहीं पाया , फिल्मी पार्टियों में सोशल मीडिया जैसे बनावटी प्लेटफार्म पर अपने प्रति लोगों के प्यार ढूंढा करता था, और कुछ भी अनर्गल दिख जाने पर मायूस हो जाता था। आज उसे ऐसा महसूस हो रहा था कि ये प्यार ये लगाव दिखाने की चीज नहीं है सभी कि यही चाहत होती है कि वो पास रहें वो ऐसा खालीपन नहीं चाहते, उनलोगों की कोई गलती नहीं है सभी अपने जीवन को जीने में इस कदर मशरूफ है यह बताने के लिए इतना वक्त नहीं है किसी के पास वो कितना ख़ास है, मगर उसकी जगह कोई और नहीं ले सकता वो ये भी जानते हैं, आज इस मृत्युलोक में निशांत अब शांत हो चुका था उसकी जिज्ञासा समाप्त हो गई थी और वो बहुत खुश भी था , अपने देश के लोगों का अपने लिए इतना प्यार देखकर, लेकिन अपने पिता की खामोशी उसे झकझोर रही थी उसे एहसास करा रही थी कि वो मायानगरी में चमकने वाले स्टार से पहले एक बेटा था उनका इकलौता होनहार बेटा।
होमवर्क २२ जून का
नाम: -अनूप सहाय
उम्र:-५० वर्ष
पेशा:- बड़ी कंपनी में हाइजिन मैनेजर
विवरण:-वैसे तो पचास की उम्र में तीस साल के नौजवान दिखते हैं अनूप जी।बाल काले कर जब सुबह- सुबह बड़मूडा टी-शर्ट में जाॅगिंग को निकलते हैं तो अम्मा सी दिखने वाली अर्धांगिनी जो उनकी आदतों से वाकिफ हैं साये की तरह साथ होती हैं।
कलाकार,साहित्यकार,कवि के रूप में सोशल मीडिया में छाए भी रहते हैं।पर आजकल ये अपनी महिला मित्रों के निशाने पर हैं क्योंकि इन्होंने इस बार गलती ही ऐसी की है अपनी लेखनी से बता दिया कि नारी को वो कटी पतंग टाइप समझते हैं , हालांकि इस बार लिखा वही जो वो सचमुच समझते हैं इससे पहले तो हर मुद्दे पर इतनी बड़ी-बड़ी बाते फेंकते थे कि सब सोच में पड़ जाते थे,एक सखी ने तो इनका नाम ही तार्किक महोदय रख दिया ,खैर मर्दों से ज्यादा घुलते-मिलते नहीं देखा पर औरतों में चाहे वो जिस उम्र की हो दिलचस्पी ज़रा ज्यादा ही लेते हैं, जवानी में भाग कर शादी करने तक की हिम्मत दिखाई थी पर पकड़े जाने पर लड़की वालों के आगे समर्पण कर दिया ,फिर घरवालों ने जिससे इनका ब्याह रचाया कहने को तो अभी तक वही उनके बेटे की मां हैं पर एकाध और भी हैं जो इनके नाम का सिन्दूर लगाए आज भी अकेली रह रही है, इस्तेमाल करके मुकर जाने की पुरानी आदत अब भी बरकरार है इनकी।बस बाहरी लोगों के सामने ही मृदुभाषी है पर वैसे इनके विचार बहुत ही घटिया है ।
वायरल पूजा.......
कुछ खास तरह के पूजा पाठ किसी भी राज्य में चलें जाएं, लगभग एक जैसी ही पूजन विधि देखने को मिलती है, पूजा चाहे संतोषी माता की हो सत्यनारायण भगवान कथा हो या करवा माता या फिर हमसबके साईं बाबा के या चाहे और कोई तथाकथित भगवान लेकिन ये बिल्कुल नई वाली माता यानि हमारी कोरोना माता की पूजा हर राज्य हर जिले में अलग-अलग तरह के देखने को मिल रही है, कारण शायद सोशल मीडिया ही है जो अलग-अलग तरह के पूजन विधि से रोजाना अवगत करा रहा है या यूं कहें वायरल कर रहा है ये नौ लड्डू और कोरोना मईया के नौ गीत वाला पूजा विधि ठीक से फैला भी नहीं कि अक्षत गुड़ और गुड़हल के फूल को गढ्डों में दबाकर कोरोना मईया से विनती वाला पूजा वायरल हो गया फिर वो पीली साड़ी वाली वाली भौजी का विडियो में कोरोना मईया का गाय से औरत बनने का आंखों देखा वाला कथा सुनाना उसमें नये तरीके की पूजन विधि । अरे! हम तो एकदमे कनफ्यूजिया गये है कि आखिर कौन वाले पूजा विधि से कोरोना मईया खुश होंगी अगर कोई दीदी जी या कोई बहिन जी को यदि सही पूजा विधि मतलब असरदार पूजा मालूम हो तो थोड़ा हमको भी बताने का कष्ट करियेगा। जय कोरोना मईया
हमसाया____
शिवानी का संजय के लिए रोज का उलाहना जारी था,मेरी तो जैसे किस्मत ही फूट गई है इन्हें तो जब देखो काम का रोना और छुट्टी वाले दिन में बस बिस्तर पर लेटे लेटे चैनल बदलते रहना है मैं तो कहीं दिखती ही नहीं ,वो सेकेंड फ्लोर वाले गुप्ता जी को देखो जहां जाते हैं अपनी मिसेज को साथ लेकर जाते हैं अरे सैलून भी जाते हैं तो भी उनकी मैडम साथ होती है कहीं से भी उनकी जोड़ी नहीं जमती अम्मा लगती है वो गुप्ता जी की फिर भी एक वो पति है एक मिनट भी साथ नहीं छोड़ता और एक मेरे पति हैं हाय रे मेरी किस्मत , जबसे मिस्टर गुप्ता इस सोसायटी में आये है, संजय को ऐसे जुमले शिवानी के मुंह से रोज ही सुनने को मिलती थी; सोसायटी की लगभग सभी महिलाएं मिसेज गुप्ता की किस्मत से जलती थी।आज सुबह जब शिवानी सब्जी लेने नीचे गई तो सामने वाली फ्लैट की विभा भाभी मिल गई मिसेज गुप्ता भी अपनी कामवाली को ठेले वाले के पास छोड़ मिस्टर गुप्ता के साथ बाइक पर फुर्र हो गई शिवानी ने एक ठंडी आह भर विभा भाभी से कहा भाभी जी मिसेज गुप्ता ने आखिर किस भगवान की पूजा की होगी जो ऐसा पति मिला इनको जहां देखो दोनों साथ होते हैं और एक मेरी तकदीर है विभा भाभी भी हां में हां मिलाकर अपनी तकदीर का रोना रोये जा रही थी; गुप्ता जी की कामवाली भी उनकी बातें सुन रहीं थीं हंसते हुए उसने शिवानी से कहा मेमसाब आपलोग अंदर की बात क्या जानो हमारे साब से ज्यादा बदकिस्मत कौन होगा बेचारे ! बड़े ही रंगीन मिजाज के हैं एक बार तो रंगे हाथों पकड़े गए थे वो, किसी और के साथ, खुब हंगामा हुआ था मेमसाब ने पुलिस की धमकी दे डाली थी तब बेचारे को माफी मांगनी पड़ी थी और कोई प्यार व्यार नहीं है इनकी ,ये तो डर है परिवार का समाज का, उसके बाद तो अपनी मेमसाब हरवक्त गोंद की तरह चिपकी रहती है साब से और मेमसाब आपलोग भी ना बेकार में अपनी किस्मत को कोस रहे हो। विभा भाभी ने आश्चर्य से पूछा तू सच कह रही है? सौ टका सच कह रही हूं मेमसाब किसके घर में क्या लफड़ा चल रहा है सब समझती है मैं पर मेरे को क्या अपने काम से मतलब रखने का है बस ! कामवाली की बातों को सुनकर दोनों को मिसेज गुप्ता के लिए बहुत बुरा भी लग रहा था। विभा भाभी को जैसे नया मसाला मिल गया , देखा शिवानी मर्द जात पर कोई भरोसा करें भी तो कैसे करें बेचारी मिसेज गुप्ता, पर मेरे संजय ऐसे नहीं हैं भाभी! शिवानी की बातों को काटकर दरवाजे से आधी मुंडी निकालते हुए विभा भाभी ने चेताया शिवानी जरा नजर बनाए रखना अरे है तो आखिर मर्द ही ना समझी ; जी भाभी समझ गई, घर में घुसते ही संजय को लाड़ दिखाते हुए पूछा पकौड़े बनाऊं खाओगे शिवानी के बदले व्यवहार से चकित संजय ने सर हिला कर हामी भर दी और किचन से पकौड़े की छन-छन के साथ शिवानी की गाना गाने आवाज संजय को सरप्राइज करे जा रहा था । तु जहां जहां चलेगा मेरा साया साथ होगा मेरा साया मेरा साया.......
लाॅकडाउन की देन_____
इस कोरोनाकाल में टीवी देखने और सोशल मीडिया में कुछ ज्यादा ही समय निकल जाता है और कभी- कभी कुछ मजेदार सा भी दिखाई दे जाता है ,वो सीन आज यकायक याद आ गया तो मेरी हंसी रोके नहीं रूक रही ,आप सबसे सांझा कर तो रहीं हूं पर आप ये मत समझना कि मैं ऐसी ही हूं ; मतलब बेशर्म टाइप । तो चलिए मुद्दे पर आते हैं कुछ दिन पहले एक शादी दिखाई जा रही थी टीवी पर जिसमें वर-वधू एक छड़ी के सहारे जयमाला (वरमाला) करते दिखाई दिए उसके बाद फिर किसी दूसरे विवाह में भी यही सीन दिखाई दिया ,तो कहना यही है कि ये छड़ी वाला दिखावा क्यों इसलिए क्योंकि मिडिया वाले रिकॉर्ड कर रहे हैं और सोशल डिस्टेंस दिखाया जा रहा है तो भईया अगर सोशल डिस्टेंस, ना ना! फिजिकल डिस्टेंस ही रखना था तो बऊआ को ई लाॅक डाउन में का जरूरत थी बियाह की तनिक देशबंदी खुलने तक रुक जाते , और ऐसे भी आने वाले महीनों में तो देशबंदी की धज्जी उड़ने ही वाली है; अब अस्पताल चाहे सरकारी हो या निजी ,शहर हो या फिर गांव लेकिन रेडियोलोजिस्ट और ग्यानोक्लोजिस्ट के यहां तो ऐसे भी हर साल से ज्यादा भीड़ लगने वाली है; लाॅकडाउन की दुआ से ; आगे और क्या बताएं बाकी आप सब खुद ही समझदार है।
मोक्ष____
गौरव भईया के आए फोन ने नेहा को स्तब्ध कर दिया ,आंखों से अविरल बह रहे आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे ,पापाजी की ऐसी मृत्यु होगी ! कितने खुश थे वो जब गौरव भईया ने कहा था कि वो इस बार पापाजी को अपने साथ अमेरिका लेकर जाएंगे कहते थे बेटियों पर बोझ नहीं बनना चाहते वो मुक्ति तो उन्हें बेटा ही दिलायेगा, पापाजी की जान बसती थी गौरव भईया में। जबसे गौरव भईया की नौकरी एक विदेशी कंपनी में हुई उनकी पोस्टिंग भी न्यूयार्क में हो गई पर उस वक्त वो मां तथा पापाजी को वहां रखने की स्थिति में नहीं थें, कारण उनका छोटा फ्लैट था तबसे दोनों बहने ही मां पापाजी के पास बारी-बारी से आती-जाती रहती थी पिछले साल मां भी हमारे बीच नहीं रही तबसे पापाजी को नेहा ज़बरदस्ती अपने साथ ले आई थी अक्सर पापाजी को उदास देख कर एक दिन उसने कहा भी था क्या पापा अपने इंडिया में ऐसा क्या नहीं है जो अमेरिका में है तब पापाजी का ज़बाब सुन कुछ बोल नहीं पाई थी, उन्होंने कहा कि यहां मेरा बेटा नहीं है अब भगवान का बुलावा कब आ जाए क्या पता मुझे मोक्ष तो आखिर उसके ही हाथों मिलेगा ना बेटा ,पापाजी के ऐसी सोच पर हंसी भी आ जाती थी। इस बार छुट्टीयों में जब गौरव भईया और भाभी भारत आए पापाजी को अपने साथ ले गए पापाजी की खुशी तब देखते ही बन रही थी, लेकिन वहां पर थोड़े दिन पहले ही पापाजी की तबीयत ख़राब हुई जांच में पता चला कि वो कोरोना महामारी के चपेट में आ गए हैं तबसे वो वही के एक बड़े अस्पताल में ही भर्ती थे ,आज जब पापाजी का देहांत हुआ तब गौरव भईया तो उनकी आखिरी दर्शन भी ना कर पाए उन्हें बेटे के हाथों मोक्ष तो क्या उनका अंतिम संस्कार भी वहां के सरकार के बनाए नियमों के तहत सामूहिक रूप से एक कब्र में दफ़न कर किया गया था , पापाजी की ऐसी दुखद विदाई होगी उनके किसी दुश्मन ने भी ऐसा नहीं सोचा होगा। नेहा बार- बार नीतू दीदी से कह रही थी क्या पापाजी को हम बेटियां मोक्ष नहीं दिला सकती थी ?
महारानी.......
ललिता की खुशी का राज बड़ा ही अद्भुत है!उसके शहर में कोरोना महामारी की वजह से हुई लॉकडाउन के कारण उसकी सभी मेमसाब ने हुकुम दे दिया है कि अभी वो दूरी बनाए रखें, वो भी बिना कोई दिहाड़ी काटे। आज तो वो अपने आप को महारानी जैसा अनुभव कर रही है,सुबह से ही चन्दा ,खुशबू का बापू रसोई में घुसा है चाय - नाश्ता बना रहा है और लाड़ तो ऐसे जता रहा है जैसे वो वही पन्द्रह साल पुरानी वाली ललिता हो वो तो जैसे शर्म से लाल हुई जा रही है ,आज उसे रसोई से पूरी तरह की छुट्टी और कपड़े बर्तन साफ- सफाई वो सारे काम तो चन्दा और खुशबू ने कब के खत्म कर डाले और सबसे अच्छी बात तो ये कि अब कहीं से भी चन्दा के बापू को पव्वा नहीं मिलने वाला। तो अब काहे का रोना।
देवी मइया की जय......
खेला तो शुरू हो चुका था ,पर फिर भी कुछेक को मजा नहीं आ रहा था ।डीजे में कानफोडू भक्ति गीत बज रहे थे, ऊपर से ढोल मंजीरे की थाप भी थी ,उसकी धुन पर नौजवान भक्तों की टोली या फिर झुंड कह ले मदमस्त होकर झूम रहे थे ।हाथी ,घोड़े, ऊंट और रथ वाली झांकी भी तो थी ,ये वाला नजारा तो एकदम नया था ,आगे-आगे टैंकर से पानी गिरता और कुछ श्रद्धालु बहिनें सड़क पर झाड़ू लगा कर फूल बरसा कर देवी मइया की गाड़ी को आगे बढ़ाने में मदद करती दिखाई दे रही थी। इन तमाम तामझाम में देवी मइया की विदाई की रस्म अदायगी की जा रही थी, लेकिन इतना होने पर भी मोहल्ले के कुछ नौजवानों की इंटरटेनमेंट नहीं हो पा रही थी। वैसे देवी मइया की चौकी के नीचे इंटरटेनमेंट का पूरा साजो सामान सजा रखा था; पर निकालने का मौका या यूं कहें सही वक्त नहीं मिल पा रहा था। पर अचानक ऐ क्या ! मइया की मूर्ति पर ईंट का छोटा टुकड़ा आकर गिरा और मूर्ति हुई खंडित और फिर! फिर क्या कुछ गर्म खून वाले नौजवानों की इंटरटेनमेंट चालू। बाजारों में दुकानों के शटर धड़ाधड़ गिरने लगे, थाना और प्रशासन मुस्तैद हुए ,सड़कें वीरान हो गई, अस्पताल में किसी के अम्मी ,आपा छाती पीट रहे थे, तो कोई मां उस दिन को कोस रही थी।
लुप्त-------
शकुन्तला! तू यहां इस गांव में कैसे?
और यह बच्चा !
मेरा है दीदी ।
और तेरा पति कहां है?
वो मेरे साथ नहीं रहता दीदी ।
समझी! तो दुष्यंत ने अंगुठी फिर से गुम कर दी।
बचपन .........
बातें मेरे बचपन की! करीब तीस बत्तीस साल पहले की उस वक्त हमारे पास ऐ मुआ मोबाइल फोन नहीं बल्कि कई सारे खेल खिलौने होते थे, गुड्डे गुड़िया, गाना गोटी, इमली के बीज के पासे, टूटी कांच की चूङियों की गोटी, सेफ्टी पीन के गुच्छे से एक्कठ दुक्कठ का खेल, रूमाल से दादा जी की चिट्ठी, पो चम्पा, डेंगा पानी, कुलिया चुकिया, घरौंदे और भी ना जाने कितने सारे प्यारे-प्यारे खेल। और जब हम लोग लुकाछिपी में ढूंढने वाले को चुनते थे तब एक पापुलर लाइन गा कर चुनाव करते थे ( एक सलाई दो सलाई तीसरा बोले लपलाई ) और ऐ वाला तो आज भी कभी याद आता है तो हंसी रोके नहीं रूकती (आलू बटा सेम पकाने वाला मेम एक बजे की गाड़ी आई देखो लङका टेम ) मन बहलाने के लिए कितने सारे मनोरंजन । जब जाङो में छत पर घर की सभी औरतें अचार बनाने मे स्वेटर बुनने मे लगी होती थी, हम बच्चे कितने सारे प्लान बना लेते थे के संडे को खास कैसे बनाया जाए ऐसा ही एक संडे आज भी याद आता है तो नीरस सी जिन्दगी में बहार आ जाती है । कङकङाती ठंड पङ रही थी और हम सब मोहल्ले के बच्चों ने अनोखा प्लान बनाया था कि शाम को हमसब लाइन लगा कर घर के सामने बाली नाली में पौटी करेंगे वो भी एक साथ । चलो भई प्लानिंग हो चुकी थी और हम सभी तय समय पर इकट्ठे भी हो चुके थे मेरी प्यारी सहेली ना ना नाम नही बताऊंगी उसकी क्योंकि fb पर वो मेरे फ्रेंड लिस्ट में है मिलने पर मुझे बहुत पिटेगी । हां तो हुआ ये कि मेरी भोली सी सखी भी सैंडल और मामी जी के हाथों से ऊन की बुनी हुई सुन्दर सी फ्राॅक पहन कर नाली पर हमसब के साथ पंक्ति मे बैठी पर ऊंची हील की सैंडल ने साथ नहीं दिया और फिर धङाम वो भी उस गन्दे नाले में। अब तो हमलोगों को काटो तो खून नहीं वाली हालत हो गई और जब ये बात मामी जी को पता चली तब तो बेचारी की और भी बुरी हालत हो चुकी थी ठंडे पानी से भरी भरी बाल्टी उसपर डाले जा रहे थे और डर से हम सारे बच्चे थर थर काँप रहे थे पर कुटाई तो सबकी हुई पर मजा भी खूब आया । वो दिन अब तो सिर्फ यादें बनकर रह गई । अब जब अपने बच्चों को देखती हूँ तो लगता है कि जब ये अपने बचपन को याद करेंगे तो कितनी बेरंग यादें होगी इनकी कम से कम हम अपनी यादों को संजोए तो है, काश! वो बचपन फिर से आ जाता ! चलो फिर से वैसा वाला इन्तजार करते है जब अपने दांत टूटने पर उसे मिट्टी में दबा कर रोज पानी डालकर इन्तजार करना कि दांत का पेङ कब निकलेगा ........................................
विगत दिवस........
सैंकड़ों दिवस फिर बीत गए,
मेरे इस प्रण को किये हुए ,
जब ठाना था मन में मैंने
कि ,यादें तुम्हारी मैं आने ना दूंगी
बस कर्म की भट्टी में जलती रहुंगी ,
मन को मिले मेरे जितने घाव हैं तुमसे
चाहे वो अब भले ना भरें ,
पर यादें तुम्हारी मिटा के रहूंगी,
पर ! ये दो आंखें मेरी ,
निरीह सी निर्बल सी मौन सी,
इसका क्या ; ये तो लगता
बेमौसम की बारिश हो जैसे
इनके लिए दिन क्या और रात क्या
ग्रीष्म क्या, बरसात क्या,
शाय़द ठान लिया है इसने भी ,
मेरी बात वो ना मानेंगे
खुद तो तरसेंगे ही ,और मुझे भी
विगत क्षणों की भांति फिर से
प्रत्येक दिवस तड़पायेंगे ,रूलायेंगे.....
नियत____
गैरों के मन को ,
परखने का दम भरने वाले
कुसुम रंगों से सजी,
प्यार का भ्रम देने वाले,
मढ देते हैं अनेक दोष,
तब नियती पर,
जब आ जाती है
बात अपने पर,
किसी की आंखों का सैलाब
नहीं देख पाते,
समानुभूति का पाठ पढ़ाने वाले।
मुक्त______
बेजान हो चुकी
बेनाम सी इस
बेतरतीब बन्धन में
उलझे हुए रिश्ते से
मुक्त क्या तुम
कभी हो पाओगे ?
मन का तराजू
जो है तुम्हारे पास
सही क्या ग़लत क्या
तुम्हें तो सब कुछ
होता है पता, है ना
तुम्हारे शब्दों में
वो उन्मुक्त होना
एक दिन तो
सबको होना है
पर कुछ बेचैन से
मेरे सवालों में
अब तक हैं उलझे
सुलझा लो ना
तब होना उन्मुक्त।
उम्रदराज.......
उम्र तो जैसे हाथों से रेत की तरह फिसलती रही, और
हम अभी तक मुट्ठियां भिंचे अपनी , खुद पर इतराते रहे।
जब निगाह आईने पर पड़ी आज , यकायक
सफेद पड़े बाल और झुर्रिदार चेहरे ने पूछ डाला ;
डरावना सा इक सवाल, हां तो बताओ
इस बार का जन्म दिन कहां मनाओगे?
यादें मेरी_______
तुम अपनी कसम निभाओ प्रिय
मैं अपना धर्म निभाऊंगी
तेरे मन के किसी इक कोने में
वो यादें मेरी,जो बिखरी पड़ी
रहने दें वहीं,वो यादें मेरी
कुछ धुंधली सी, कुछ मुड़ी-तुड़ी
तुम क्यों डरते रहते मुझसे?
ना पास कभी अब आऊंगी
जब पार क्षितिज के जाऊंगी
तब साथ उसे ले जाऊंगी
तुम अपनी कसम निभाओ प्रिय…
मैं अपना धर्म निभाऊंगी।
दीदार तुम्हारा________
कभी धङाम से ,
कभी धङाक करके,
कभी हौले से
तो कभी चुपचुपा के
हर वो दरवाजे
बंद कर देते हो तुम,
जिधर से तुम्हारे दीदार की
कोशिश रहती है मेरी ,
लेकिन क्या तुम्हें मालूम है?
कि कुछ दरवाजों में
सुराख भी हुआ करती है ।
एक उम्मीद सी है, बस_____
मैं अपने ईश्वर में
विश्वास रखती हूं
और मेरा मन मुझसे
अक्सर कहता है कि
तुम एक दिन मुझसे
दोबारा मिलोगे
एक उम्मीद सी है
और उम्मीद कभी भी
छोड़नी नहीं चाहिए; है ना
याद है मुझे वो दिन
और उस दिन तुम्हारा
अचानक से मुझसे
ऐसे ही बिना किसी बात के
मुझसे मुंह मोड़ लेना
बात कुछ समझ में नहीं आई
तुम्हारा यूं चले जाना दूर
फिर कभी वापस नहीं
आने के लिए वो हमारी
आखिरी मुलाकात तो
नहीं हो सकती?ना ना!
एक उम्मीद है कि
हम फिर मिलेंगे ,और
उम्मीद कभी छोड़नी
नहीं चाहिए ,है ना !
जैसे पृथ्वी अपनी संतुलन
बनाए रखना जानती है
और फिर लील लेती है
कई जिंदगियां लेकिन
अपना संतुलन बिगड़ने नहीं देती
शायद वही संतुलन
तुमने भी बनाया होगा
अपनी जिंदगी में
लील ली मेरी खुशियां
जो तुम्हारे दिल के रास्ते
होकर गुजरती थी कभी
जैसे तराजू में पड़े
एक पलड़े में वज़न
ज्यादा होने से संतुलन
बिगड जाता है और
उसे पलड़े से निकालते ही
पलड़ा बराबर हो जाता हो ,
ठीक वैसे ही तुम्हारे रिश्ते
बराबर हो गए ! है ना
पर तुम्हीं बताओ भला
ऐसे विकट समय में
इस भयंकर महामारी से
अगर सब उबर भी जाएं
तो क्या तुम्हारी जिन्दगी
पहले की तरह होगी
वैश्विक मंदी में मान लो
नौकरी ना रही तुम्हारी
तो क्या तुम फिर भी
इस शहर में अपना ठिकाना
तलाशोगे या हो जाओगे
आंखों से ओझल
इस शहर से या
अपने आप में मशगूल
सबसे होके दूर ? बोलो ना!
परन्तु मुझे उम्मीद है
ईश्वर में विश्वास रखती हूं
और मेरा मन अक्सर
कहता है कि तुम एक दिन
मुझसे दोबारा मिलोगे
और उम्मीद कभी भी
छोड़नी नहीं चाहिए; है ना........
तुम्हारे वो अल्फाज______
तुम्हारी द्वारा कही गई
मेरे लिए कई सारी
बातें हैं , जिसमें
मेरे लिए कही गई
कुछ अच्छी बातें है
और कुछ बहुत बुरी
बातें भी ,वो सब
बातें जानें कब की
भूल चुकीं हूं मैं
पर नहीं भूली मैं
आज तक तुम्हारे
द्वारा कहे गए वो
चंद अल्फाज वो
लिखकर मुझ पर
तोहमत लगाना कि
मैंने तुम्हें # उससे
'छिनने का प्रयास किया'
नहीं भूलते मुझे
किसी शूल की तरह
चुभती है हर वक्त
ना दिन देखती है
ना रात, ना तन्हाई
ना भीड़भाड़, बस;
चुभती रहती है
हर पल तुम्हारे कहे
वो चंद अल्फाज......
तुम्हारी आखिरी मुहब्बत...
हम जैसों की उम्र
जब अपने ढलान
पर होती है , तो
जाहिर है ; तब
जरुरत एक ऐसे
साथ की होती है
जो बांटे हर दर्द,
हर ग़म हर खुशी
बिना नफे नुकसान के
कई होते हैं ऐसे भी
पास जिनके सिर्फ
किसी का साथ होता है
किसी के पास
सिवाय एक एहसास
कुछ पास नहीं होता है
होते है ऐसे भी कई
जो साथ किसी के होते है
फिर भी उन्हें तलाश
किसी खास की होती है
विरले ही होते हैं
तुम जैसे शायद
जो ताउम्र सच है
छुपाते मन में
किसी और को
बसा कर दिल में
उस साथ भर को
अपनी आखिरी प्यार
बताते हैं , चलो छोड़ो
अब तो मान लो
कि तुम्हारे दिल में
किसी के लिए
इक कोना आज भी है,
शायद! सच कहने से
कतरा रहे हो, है ना
रहा होगा आज
कोई खास दिन
तुम्हारे निभाये गए
इस रिश्ते का
पर तुम्हारी उस
आखिरी मुहब्बत के
'मौत' तुम्हारी प्रेमिका
ये मौत भी कभी
किसी की मुहब्बत
हुई है भला! पर
तुमने कहा तो
तुम्हारी कही
चलो मान लेते हैं
उसे तुम्हारे पास
आने से पहले
जानना चाहेंगे
हम भी उसे,
जिसके पास होने का
तुम्हें नहीं होता
कभी भी एहसास
शायद वो भी कभी
हुआ करती थी ख़ास
पर हर बार तुम्हारा
उस साथ भर को
यकीन दिलाना कि
तुम ही बस उसकी
जान हो जहान हो
शक पैदा करता है
मन में होती है
जब सच्ची मुहब्बत
तो आंखों में
दिख जाती है
नहीं पड़ती है जरूरत
जताने की बताने की
बार-बार समझाने की
तो फिर उम्र के
इस आखिरी पड़ाव पर
सच तो कह दो
क्या मन में अपने
एक बोझ लिए
अपनी आखिरी मुहब्बत
हां उसी आखिरी मुहब्बत
से मिला पाओगे नज़र ?
बोलो तनिक बोलो ना .....
रिश्ते
रिश्ते बनाए तो
बड़ी आसानी से
जाते हैं , लेकिन
निभाने में बहुत
मुश्किल होती है,
ओस की बूंद सी
जाड़े की धूप सी
जैसे कई सारे मिलते हैं
उसे नाम पर फिर भी
वो खास रिश्ता
अनाम हो जाता है
उनकी नज़र में ,
कायर होते हैं वो
जो बड़ी आसानी से
एक खुबसूरत रिश्ते को
बदनाम करने की
साज़िश रचते हैं
ओढ़ कर समाज के
डर का ओछा सा लबादा
अब अपने धर्म का
निर्वाह करते हैं
खुद हो जाते हैं गुमनाम,
लगा कर कलंक
करके उसको बदनाम,
खुद को करके पाक साफ
उन जैसों के लिए ही
ख़ास रिश्ते हराम होते हैं
मुकर जाने से उसके
रिश्ते अनाम हो गए
पूछो तो कभी उनसे
जो जीते हैं बड़ी ही
शिद्दत से इस आधे
अधूरे से रिश्ते को
उनके लिए यह
आधा सा रिश्ता
ही उनकी जिंदगी
तमाम होती है
रिश्ते कभी अनाम
नहीं होते, हो जाते हैं
बेनाम वो जो
इस रिश्ते में
बदनाम होते हैं______
वर्ग विशेष____
देखा है कई
बुद्धिजिवियों को
जो बातें करते हैं
बड़ी- बड़ी
करके स्याही का
उपयोग ; रंग देते हैं
पन्ने कोरी
दिवस चाहे हो कोई
पर्यावरण दिवस,
प्रेम दिवस
मातृ दिवस,
मजदूर दिवस
चाहे हो नारी दिवस
अपनी लेखनी से
करके अचंभित
देते हैं राय अपनी
पंछी, पेड़, धरती,
अम्बर, जानवरों पर
इतना प्यार दर्शाते हैं,
काश!
होता उतना ही प्यार
उन्हें ज़िन्दा इन्सानों से भी
जब बारी आती है
कुछ कर गुजरने की
सच कहने की
किसी को उसका
हक दिलवाने की
तो उतार कर मुखौटा
अपना छुप जातें है
पीछे परदे के
बारी-बारी
और अवतरित
होते हैं तब
जब महफ़िल हो सजी
बिकाऊ पुरस्कारों में
पर्ची लगी हो
उनके नामों की ,साथ हो
फूलों की लड़ी
और हाॅल हो कुछ
मुखौटाधारी
मेहमानों से भरी -भरी
तब दिख जाते हैं
कितने ही बुद्धिजीवी
माइक पकड़ कर
चिखते चिल्लाते
बातें करते बहुत सारी
बड़ी-बड़ी..........
बनावटी से तुम______
चौंक उठी थी उस दिन मैं
जब देखा था मैंने रुप तुम्हारा
खिलखिलाता सा वो चेहरा
दिख गया था अनायास ही मुझे
एक दिन उस राह से गुजरते हुए
सोचने पर मजबूर हो गई मैं
कि ऐसी हंसी तुम्हारी कभी
मुझे क्यों न दिखी कभी
क्या तुम बनावटी थे?
जो हरवक्त गंभीर था कभी
क्या मेरी उपस्थिति से नाखुश था?
वो चेहरा तो खुलकर हंसता है
मुस्कुराता और ठहाके लगाता है।
पर यह सवाल तो जो आज भी
मुझे तड़पा रहा है चिढ़ा रहा है
क्यों -क्यों आखिर क्यों उसके मुख पर
मुझे मौन ही दिखता रहा अक्सर? क्यों.......
धड़कन........
कुछ दिनों पहले तक
लगता था ,यूं मुझको
कि ,मैं ही इक जा़न हूं उनकी
और मेरा दिल भी तो!
उनकेे सीने में धड़क कर
अपनी हाजिरी हर पल
वहीं की लगवा रहा था
लेकिन ;वक्त वे वक्त
अब दिखने लगा है मुझे ,
कि मोहतरमा कोई और भी है
जो अब उनकी जा़न ,जांना ,जा़निब
से भी बढ़कर हुए जा रहीं हैं
तो अब मैंने भी बकायदा
पूरे होशोहवास में,
अपने दिल को संभाल
उस पद से इस्तीफा दे ही दिया।
तबसे मेरी नींदें भी पूरी हो रही है ,
और मेरा दिल भी अब मेरे पास है।
ताना-बाना.......
तुम उलझे रहो
अपने ही बुने हुए
ताने-बाने में
कभी चांद सा
धुंधला, चमकीला
तो कभी इन्द्रधनुषी
सतरंगी रिश्ते के
अपने प्रेम प्रदर्शन
कभी उसके उलाहने का
कभी रुठने मनाने का
सब कुछ इस रिश्ते में
ढकोसला मात्र है
इन दिखावटी लीलाओं
की बुनियाद इनके
रिश्ते की तरह ही
अन्दर से खोखली होती है
कितना भी ढक लो
जाने कितनी दफा हिलती है
खिसकती है ! हां कानूनी,
सामाजिक या पारिवारिक
डर से मरम्मत का कार्य
साल दर साल होता है
आज ऐसे ही एक
हमसाया हमसफ़र
इक दूजे के पूरक
कहलाने वाले जीवनसाथी
के एक की विदाई के
क्षण में निर्जिव होते
शरीर से पहले ही उनके
अंगूठे के छाप लिए जाने का
कार्यक्रम शीघ्रअतिशीघ्र
किया जाता दिखा तनिक भी
आंखों में बिछड़ने का दुख नहीं
वरन् डाटा ट्रांसफर की जल्दी
ज्यादा दिखी तो समझ आई
कि ऐसे होते हैं
प्यार भरे रुहानी रिश्ते
जिनका एहसास सिर्फ
तारों की छांव में होता है
हां! ऐसा मैंने माना है
मतलब परस्त इस जहान में
सब रिश्ते मतलबी,
मायावी , दिखावटी है
तो उलझे रहो
अपने ही बुने हुए
ताने-बाने में।
बुत______
माना विभाजित हो गये तुम
परन्तु विसर्जन की बात
तो सोचना भी मत ,
मेरे हृदय स्थल में बसने वाले
वहीं हाड़ मांस की बुत हो तुम
हां सिर्फ बुत! तो क्या
हालांकि कोई फर्क नहीं
बुत और मुरत में
पर तुम्हारा बुत मुझमें धड़कता है
पल- पल हर क्षण
वो माटी की कोई मुरत नहीं कि
गाजे-बाजे के साथ विदा कर दूं
और फिर बिठा लूं एक नई
वहीं माटी की मूरत
हर्ष उल्लास के साथ
ना- ना हरगिज नहीं.....
गलियारा____________
जैसे ही दिख जाऊं मैं उनको,
महाशय मार्क जकरबर्ग निर्मित
(मुखपुस्तिका) के किसी गली मुहल्ले में,
थम जाते हैं उनके कदम
जैसे काट दिया हो उनका रास्ता
किसी काली बिल्ली ने,
नजरें चुराते हैं इस कदर
यकिनन डरते हैं कि आंखों में मेरे
फिर से डूब ना जाए कहीं
इसलिए ही शायद
झट राह बदल लेते हैं अपनी
या बंद कर देते हैं मेरी
आज मेरा भी उन गलियों से गुजरना हुआ
तो देखा उनके कदमों के निशान
जो बढती जा रही है
तो क्या मुझसे ही लुका छिपी
और उस गलियारों में
तारीफ की बधाई का खेल
तो निरन्तर जारी है ,
फिर से उनके कदम बहक ना जाएं
इसका ख्याल रखते हैं वो बखूबी
पर मेरी समझ से परे है इक बात
कि आखिर मैं भी उनकी
तारीफ के कसीदे पढ़ लूं
तो उनका क्या जाएगा
जो मुझे नहीं देखना चाहिए
क्या वो दिख जाएगा?
या फिर मुझसे प्यार हो जाएगा।
याद तुम्हारी.......
अधूरे से हम गुम थे उसी ख्याल में कि
ना करेगें याद तुम्हें ,
और तुम हो के जाते ही नहीं
मन से मेरे, पलकें मूंदे ही थे कि
बंद पलकों के किनारे से लुढकते
नीर की बूंदे मुझे चिढ़ाते हुए
अट्टहास करके जाने कितने सवाल
करती रहती है मुझसे
नहीं दे पाती हूं जवाब
उसके किसी सवाल का
हर सवाल नश्तर सा चुभता है
और तुम्हारी यादें हैं
कि मंडराती है इर्द गिर्द
मेरे मन के जुगनुओं से
जो धुंधली सी काली रातों में
चमकता है और फिर छुप जाता है धूप में
शाम को फिर चमकने के लिए
और वही तुम्हारी यादों में अपने मोतियों सी पिरोये
सपनों की लड़ियां एक- एक कर चमकाता है ,
दिखाता है वो सारे सपने जो कभी
तुमने मेरे साथ मिलकर देखा था
दृश्य वो सभी आंखों के सामने आते है जाते है
कानों में वही मंदिर की घंटियों की टन -टन
और मस्जिद के अजान के सुर का सुन्दर मधुर तरंग के
घुले मिले आवाजों में जब हम भी घुल जाते थे....
देखो ! फिर दिखने लगे वो सारे दिवास्वप्न
जाओ अब जाओ भी
ना तुम्हें है अब मेरी जरूरत
ना कोई दरकार तुम तो पूर्ण हो
सभ्य, सामाजिक ,सम्पूर्ण हो
रहने दो मुझे अपने मन से किए वादे पर अडिग
ना डिगाओ मुझे अपने पथ से
जाओ चले जाओ मेरे मन से
हां सिर्फ मेरे मन से
खुशबू की ठंडी बयार बनके।
यशोधरा फिर अकेली _________
सत्य की खोज में निकल पड़े
उस दिन सिद्धार्थ का अपनी
सोती हुई यशोधरा एवं राहुल
को अकेले छोड़ जाने के
निर्णय से तुम मर्माहत हुए थे
यशोधरा के अकेलेपन
के दर्द से पीड़ा होती थी
उसके परित्यक्ता कहलाने से
तुम्हें तकलीफ होती थी
तुम्हीं ने कहा था ना कि
गलती क्या थी उसकी
सिद्धार्थ से गौतम बुद्ध
के महानिर्वाण तक
यशोधरा की सहभागिता ही
उनके रास्ते का पत्थर होते
तो अब तुम्हीं बोलो ना
एक सत्य; ना ,ना सही की खोज में
तुम भी निकल पड़े
फर्क बस इतना कि
सत्य का पता तुम्हें मालूम था
और तुम्हारे
सही ग़लत के इस निर्णय से
अनजान एक यशोधरा
आज फिर अकेली रह गई
उसके दर्द से क्यूं पीड़ा ना हुई तुम्हें?
बोलो ना__
एक सत्य पर विजय पाकर
दूसरे सत्य से मुंह मोड़ना
क्या यही सत्य की खोज है ?
क्या यही तुम्हारी जीत है?
शायद...............
सालों से टूटी पड़ी हूं मैं
आज की तारीख में डरी हूं
फिर भी सब कहते है
बहुत मजबूत हूं मैं
अब भी हो नहीं पाती
मुझसे अपने लिए कुछ
मनमर्जियां ना रूठती हूं
ना मना पाती हूं खुद को
ना करती हूं जिद कुछ अपने लिए
फिर भी सब कहते हैं
बहुत मजबूत हूं मैं
डरती हूं तब भी जब
बालों में सफेदी दिख जाती है
कभी नजर आ जाती
चेहरे पर झलकती झुर्रियां
बदन के बढ़ते ताप से
माथे पर टीसती पीड़ा से
नहीं कर पाती मुकाबला
शरीर के इन चालाक दुश्मनों से
फिर भी सब कहते हैं
बहुत मजबूत हूं मैं
जब घर के पंखे खराब होते हैं
होने लगती है बेचैनी
बारी जब नये गैस के सिलेंडर
लगाने की आती है तब
कांप जाती है रुह मेरी
जब काम एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर में
चक्कर लगाने का हो
तब सोच में पड़ जाती हूं
फिर भी सब कहते हैं
बहुत मजबूत हूं मैं
करती आई हूं निर्वाह
अपने बच्चों का अपने दम पर
लेकिन थक जाती हूं बहुत
जब शाम ढलती है
रात गहराती है
तब तन्हाई डराती है
फिर भी सब कहते हैं
बहुत मजबूत हूं मैं......…शायद
आप तो ऐसे ना थे________
जितने उदार विचारों वाले आप बनते हैं दुनिया वालों के सामने काश! कि होते भी आप बिल्कुल वैसे ही समानुभूति दिखाने वाले। जब आप जैसे महान विचारों...