Wednesday, May 19, 2021

याद तुम्हारी.......

अधूरे से हम गुम थे उसी ख्याल में कि

ना करेगें याद तुम्हें ,

और तुम हो के जाते ही नहीं

मन से मेरे, पलकें मूंदे ही थे कि

बंद पलकों के किनारे से लुढकते

नीर की बूंदे मुझे चिढ़ाते हुए

अट्टहास करके जाने कितने सवाल

करती रहती है मुझसे

नहीं दे पाती हूं जवाब

उसके किसी सवाल का

हर सवाल नश्तर सा चुभता है

और तुम्हारी यादें हैं

कि मंडराती है इर्द गिर्द

मेरे मन के जुगनुओं से

जो धुंधली सी काली रातों में

चमकता है और फिर छुप जाता है धूप में

शाम को फिर चमकने के लिए

और वही तुम्हारी यादों में अपने मोतियों सी पिरोये

सपनों की लड़ियां एक- एक कर चमकाता है ,

दिखाता है वो सारे सपने जो कभी

तुमने मेरे साथ मिलकर देखा था

दृश्य वो सभी आंखों के सामने आते है जाते है

कानों में वही मंदिर की घंटियों की टन -टन

और मस्जिद के अजान के सुर का सुन्दर मधुर तरंग के

घुले मिले आवाजों में जब हम भी घुल जाते थे....

देखो ! फिर दिखने लगे वो सारे दिवास्वप्न

जाओ अब जाओ भी

ना तुम्हें है अब मेरी जरूरत

ना कोई दरकार तुम तो पूर्ण हो

सभ्य, सामाजिक ,सम्पूर्ण हो

रहने दो मुझे अपने मन से किए वादे पर अडिग

ना डिगाओ मुझे अपने पथ से

जाओ चले जाओ मेरे मन से

हां सिर्फ मेरे मन से

खुशबू की ठंडी बयार बनके।

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