जैसे ही दिख जाऊं मैं उनको,
महाशय मार्क जकरबर्ग निर्मित
(मुखपुस्तिका) के किसी गली मुहल्ले में,
थम जाते हैं उनके कदम
जैसे काट दिया हो उनका रास्ता
किसी काली बिल्ली ने,
नजरें चुराते हैं इस कदर
यकिनन डरते हैं कि आंखों में मेरे
फिर से डूब ना जाए कहीं
इसलिए ही शायद
झट राह बदल लेते हैं अपनी
या बंद कर देते हैं मेरी
आज मेरा भी उन गलियों से गुजरना हुआ
तो देखा उनके कदमों के निशान
जो बढती जा रही है
तो क्या मुझसे ही लुका छिपी
और उस गलियारों में
तारीफ की बधाई का खेल
तो निरन्तर जारी है ,
फिर से उनके कदम बहक ना जाएं
इसका ख्याल रखते हैं वो बखूबी
पर मेरी समझ से परे है इक बात
कि आखिर मैं भी उनकी
तारीफ के कसीदे पढ़ लूं
तो उनका क्या जाएगा
जो मुझे नहीं देखना चाहिए
क्या वो दिख जाएगा?
या फिर मुझसे प्यार हो जाएगा।
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