माना विभाजित हो गये तुम
परन्तु विसर्जन की बात
तो सोचना भी मत ,
मेरे हृदय स्थल में बसने वाले
वहीं हाड़ मांस की बुत हो तुम
हां सिर्फ बुत! तो क्या
हालांकि कोई फर्क नहीं
बुत और मुरत में
पर तुम्हारा बुत मुझमें धड़कता है
पल- पल हर क्षण
वो माटी की कोई मुरत नहीं कि
गाजे-बाजे के साथ विदा कर दूं
और फिर बिठा लूं एक नई
वहीं माटी की मूरत
हर्ष उल्लास के साथ
ना- ना हरगिज नहीं.....
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