बेजान हो चुकी
बेनाम सी इस
बेतरतीब बन्धन में
उलझे हुए रिश्ते से
मुक्त क्या तुम
कभी हो पाओगे ?
मन का तराजू
जो है तुम्हारे पास
सही क्या ग़लत क्या
तुम्हें तो सब कुछ
होता है पता, है ना
तुम्हारे शब्दों में
वो उन्मुक्त होना
एक दिन तो
सबको होना है
पर कुछ बेचैन से
मेरे सवालों में
अब तक हैं उलझे
सुलझा लो ना
तब होना उन्मुक्त।
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