आज सुबह से ही मन में एक अजीब सी बेचैनी हो रही थी सुजाता को एक खालीपन का एहसास, झुंझलाहट और बार - बार भीगी हुई आंखो के साथ कुछ काम करने की भी इच्छा नहीं हो रही थी। इच्छा हो भी तो कैसे आज ही तो सुजाता की शादी की बीसवीं सालगिरह है पर विशाल को गुजरे सात साल हो गए उसके बिना इन सात सालों में कितने ही कष्टों को सहते हुए दोनों बच्चों की अच्छी शिक्षा को जारी रखा किसी चीज की कमी का एहसास भी नहीं होने दिया पर आज दफ्तर से घर आने पर कुछ पल के लिए सुजाता अपने बीते हुए सुनहरे दिनों में विशाल की मीठी बातें की यादों में खोई हुई पलकों से लुढ़कते हुए मोती के साथ अकेले रहना चाहती थी । लेकिन बच्चों को उसका यूं चुपचाप होना नागवार गुजरा ।कमरे में आते ही मम्मी- मम्मी की रट लगाना शुरू कर दिया और एक के बाद एक फरमाइश की झड़ी ।बस सुजाता के इतना कहने भर से ही कि आज मुझे थोड़ी देर के लिए अकेला छोड़ दो घर में तो जैसे बवाल मच गया ।बड़े बेटे रोहन ने छोटे भाई करन से सुजाता के लिए कहा कि पापा क्यों चले गए, पूरे शहर में क्या एक यही मिली थी उनको बिल्कुल देहाती गंवारन की तरह आंसू बहाए जा रही है अच्छा होता अगर पापा की जगह.... आगे का शब्द सुनते ही सुजाता के मौन अब हिचकियों में बदल गये । वो सोच में पड़ गई। क्या वो मशीन है कि कब उसे ऑन होना है और कब ऑफ ,सब कोई और तय करेगा । उसके मन के भाव को तो उसके अपने समझ नहीं पाते कम से कम मन में घाव तो ना देते।भारी मन से यही सोचते हुए सुजाता बिस्तर से उठ कर रसोई की तरफ बढ़ चलीं।
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