Wednesday, May 19, 2021

विगत दिवस........

 

सैंकड़ों दिवस फिर बीत गए,

मेरे इस प्रण को किये हुए ,

जब ठाना था मन में मैंने

कि ,यादें तुम्हारी मैं आने ना दूंगी 

बस कर्म की भट्टी में जलती रहुंगी ,

मन को मिले मेरे जितने घाव हैं तुमसे 

चाहे वो अब भले ना भरें ,

पर यादें तुम्हारी मिटा के रहूंगी,

पर ! ये दो आंखें मेरी ,

निरीह सी निर्बल सी मौन सी,

इसका क्या ; ये तो लगता

बेमौसम की बारिश हो जैसे

इनके लिए दिन क्या और रात क्या

ग्रीष्म क्या, बरसात क्या,

शाय़द ठान लिया है इसने भी ,

मेरी बात वो ना मानेंगे 

खुद तो तरसेंगे ही ,और मुझे भी 

विगत क्षणों की भांति फिर से

प्रत्येक दिवस तड़पायेंगे ,रूलायेंगे.....

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