देखा है कई
बुद्धिजिवियों को
जो बातें करते हैं
बड़ी- बड़ी
करके स्याही का
उपयोग ; रंग देते हैं
पन्ने कोरी
दिवस चाहे हो कोई
पर्यावरण दिवस,
प्रेम दिवस
मातृ दिवस,
मजदूर दिवस
चाहे हो नारी दिवस
अपनी लेखनी से
करके अचंभित
देते हैं राय अपनी
पंछी, पेड़, धरती,
अम्बर, जानवरों पर
इतना प्यार दर्शाते हैं,
काश!
होता उतना ही प्यार
उन्हें ज़िन्दा इन्सानों से भी
जब बारी आती है
कुछ कर गुजरने की
सच कहने की
किसी को उसका
हक दिलवाने की
तो उतार कर मुखौटा
अपना छुप जातें है
पीछे परदे के
बारी-बारी
और अवतरित
होते हैं तब
जब महफ़िल हो सजी
बिकाऊ पुरस्कारों में
पर्ची लगी हो
उनके नामों की ,साथ हो
फूलों की लड़ी
और हाॅल हो कुछ
मुखौटाधारी
मेहमानों से भरी -भरी
तब दिख जाते हैं
कितने ही बुद्धिजीवी
माइक पकड़ कर
चिखते चिल्लाते
बातें करते बहुत सारी
बड़ी-बड़ी..........
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