चौंक उठी थी उस दिन मैं
जब देखा था मैंने रुप तुम्हारा
खिलखिलाता सा वो चेहरा
दिख गया था अनायास ही मुझे
एक दिन उस राह से गुजरते हुए
सोचने पर मजबूर हो गई मैं
कि ऐसी हंसी तुम्हारी कभी
मुझे क्यों न दिखी कभी
क्या तुम बनावटी थे?
जो हरवक्त गंभीर था कभी
क्या मेरी उपस्थिति से नाखुश था?
वो चेहरा तो खुलकर हंसता है
मुस्कुराता और ठहाके लगाता है।
पर यह सवाल तो जो आज भी
मुझे तड़पा रहा है चिढ़ा रहा है
क्यों -क्यों आखिर क्यों उसके मुख पर
मुझे मौन ही दिखता रहा अक्सर? क्यों.......
No comments:
Post a Comment