खेला तो शुरू हो चुका था ,पर फिर भी कुछेक को मजा नहीं आ रहा था ।डीजे में कानफोडू भक्ति गीत बज रहे थे, ऊपर से ढोल मंजीरे की थाप भी थी ,उसकी धुन पर नौजवान भक्तों की टोली या फिर झुंड कह ले मदमस्त होकर झूम रहे थे ।हाथी ,घोड़े, ऊंट और रथ वाली झांकी भी तो थी ,ये वाला नजारा तो एकदम नया था ,आगे-आगे टैंकर से पानी गिरता और कुछ श्रद्धालु बहिनें सड़क पर झाड़ू लगा कर फूल बरसा कर देवी मइया की गाड़ी को आगे बढ़ाने में मदद करती दिखाई दे रही थी। इन तमाम तामझाम में देवी मइया की विदाई की रस्म अदायगी की जा रही थी, लेकिन इतना होने पर भी मोहल्ले के कुछ नौजवानों की इंटरटेनमेंट नहीं हो पा रही थी। वैसे देवी मइया की चौकी के नीचे इंटरटेनमेंट का पूरा साजो सामान सजा रखा था; पर निकालने का मौका या यूं कहें सही वक्त नहीं मिल पा रहा था। पर अचानक ऐ क्या ! मइया की मूर्ति पर ईंट का छोटा टुकड़ा आकर गिरा और मूर्ति हुई खंडित और फिर! फिर क्या कुछ गर्म खून वाले नौजवानों की इंटरटेनमेंट चालू। बाजारों में दुकानों के शटर धड़ाधड़ गिरने लगे, थाना और प्रशासन मुस्तैद हुए ,सड़कें वीरान हो गई, अस्पताल में किसी के अम्मी ,आपा छाती पीट रहे थे, तो कोई मां उस दिन को कोस रही थी।
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