सालों से टूटी पड़ी हूं मैं
आज की तारीख में डरी हूं
फिर भी सब कहते है
बहुत मजबूत हूं मैं
अब भी हो नहीं पाती
मुझसे अपने लिए कुछ
मनमर्जियां ना रूठती हूं
ना मना पाती हूं खुद को
ना करती हूं जिद कुछ अपने लिए
फिर भी सब कहते हैं
बहुत मजबूत हूं मैं
डरती हूं तब भी जब
बालों में सफेदी दिख जाती है
कभी नजर आ जाती
चेहरे पर झलकती झुर्रियां
बदन के बढ़ते ताप से
माथे पर टीसती पीड़ा से
नहीं कर पाती मुकाबला
शरीर के इन चालाक दुश्मनों से
फिर भी सब कहते हैं
बहुत मजबूत हूं मैं
जब घर के पंखे खराब होते हैं
होने लगती है बेचैनी
बारी जब नये गैस के सिलेंडर
लगाने की आती है तब
कांप जाती है रुह मेरी
जब काम एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर में
चक्कर लगाने का हो
तब सोच में पड़ जाती हूं
फिर भी सब कहते हैं
बहुत मजबूत हूं मैं
करती आई हूं निर्वाह
अपने बच्चों का अपने दम पर
लेकिन थक जाती हूं बहुत
जब शाम ढलती है
रात गहराती है
तब तन्हाई डराती है
फिर भी सब कहते हैं
बहुत मजबूत हूं मैं......…शायद
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