वो जो तुम्हारे लिखे
चंद अल्फाज थे,
वो किसी नासूर से
कम ना थे मेरे लिए
तुम्हारे अल्फाजों की
ताखों में आज भी
कुछ दरारें दिखाई
देती रहती है
उन लफ़्ज़ों की
दरारों से ताजा-तरीन
तुम्हारे एहसासों से
मुलाकात हो जाती है
अक्सर, और वो
तड़प भी दिख
जाती है,जो ढका है
तुमने बड़ी ही
सुगमता से
सबसे छुपा के।
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